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क्लास मॉनिटर अब है देश की राष्ट्रपति

क्लास मॉनिटर अब है देश की राष्ट्रपति

 

क्लास मॉनिटर अब है देश की राष्ट्रपति

– जिस घर में दुल्हन बन पहुंची, उसी घर को बेटों और पति की याद में बना दिया स्कूल

 

शिक्षा फोकस, दिल्ली। द्रौपदी मुर्मू देश की पहली महिला आदिवासी राष्ट्रपति चुन ली गई हैं। किसी के राष्ट्रपति चुने जाने पर पहली बार विजय जुलूस भी निकाला गया। द्रौपदी का गांव। संध्या 5 दिन तक वहां रहीं और मुर्मू से जुड़ी जगहों पर गईं। वहां वो बातें जानीं, जो अनजानी थीं।

 

पढ़िए मुर्मू के क्लास मॉनिटर से महामहिम बनने तक की कहानी। महज 4 साल में पति और दो बेटों को खोने वाली मुर्मू की शख्सियत को…

 

 

तो शुरुआत 42 साल पुराना पन्ना पलटने से, जब मुर्मू का प्रेम विवाह हुआ था…

 

चारों ओर से भीगे और सुस्त पड़े पहाड़पुर गांव के छोर तक पहुंचती साफ-सुथरी सड़कें। आधा पक्का-आधा कच्चा सा एक घर। सामने बंधे तार पर सूखता एक लाल और दूसरा मटमैला गमछा और मिमयाती बकरियां।

बांस का बना छोटा दरवाजा। खटखटाया तो बाहर आए लक्ष्मण बासी। बुजुर्ग, कमर से थोड़े झुके हुए, लेकिन चुस्त। मैंने पूछ लिया- द्रौपदी मुर्मू को जानते हैं? तपाक से कहा- ‘जानेंगे क्यों नहीं, उसके घर श्याम चरण का रिश्ता लेकर हम लोग ही तो गए थे।’

लक्ष्मण बासी फिर थोड़ा ठिठके, फिर थोड़े मुस्कुराए और कहने लगे- ‘प्रेम विवाह था दोनों का। द्रौपदी के घर जाने से एक हफ्ता पहले श्याम ने मुझे बताया था- उसको प्रेम हुआ है।’ फिर यही पहाड़पुर गांव द्रौपदी टुडू का ससुराल बन गया। हां… वो पहले द्रौपदी टुडू थीं, श्याम से शादी के बाद द्रौपदी मुर्मू हो गईं।

 

 

अब जानिए उन्हें, जिन्होंने 4 साल में पति और 2 बेटे खो दिए, पीड़ा से उबरीं और शख्सियत को चट्टान बना दिया…

फिर वही पहाड़पुर गांव। एंट्री गेट पर बैनर लगा है। जिसके दोनों तरफ द्रौपदी मुर्मू की बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगी हैं। लिखा है- राष्ट्रपति पद की प्रार्थिनी द्रौपदी मुर्मू पहाड़पुर गांव आपका स्वागत करता है। यह रिजल्ट आने से कुछ दिन पहले की बात है।

यहीं पर एक बड़ी सी प्रतिमा लगी है, जो द्रौपदी के पति की है। जिस पर ओडिशा के दो महान कवियों सच्चिदानंद और सरला दास की कविता की पंक्तियां उकेरी हुई हैं। यहां से करीब 2.5 किलोमीटर अंदर दाखिल होने पर एक स्कूल है। नाम- श्याम, लक्ष्मण, शिपुन उच्च प्राथमिक आवासीय विद्यालय।

कभी यहां एक घर था। वही घर जहां 42 साल पहले देश की होने वाली राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू दुल्हन बनकर आईं थीं। तब न तो पक्की दीवारें थीं और न पक्की छत। खपरैल-फूस से बना घर और बांस का छोटा सा दरवाजा। 4 साल के भीतर इस घर ने 3 ट्रेजडी देखीं। एक के बाद एक 3 लाशें गांव में दफन हुईं। 2010 से 2014 के बीच द्रौपदी के 2 बेटों और पति की मौत हुई।

इमारत में कभी सन्नाटा ना पसरे, इसलिए द्रौपदी ने छात्र-छात्राओं का यहां आवास बनवा दिया। इतना दुख। द्रौपदी ने सहा कैसे…

उनकी भाभी शाक्यमुनि कहती हैं, ‘जब बड़े बेटे की मौत हुई तो द्रौपदी 6 महीने तक डिप्रेशन से उबर नहीं पाईं थीं। उन्हें संभालना मुश्किल हो रहा था। तब उन्होंने अध्यात्म का सहारा लिया। शायद उसी ने उन्हें पहाड़ जैसे दुखों को सहने की शक्ति दी। जो द्रौपदी बड़े बेटे की मौत से टूट गई थी, उसी द्रौपदी ने छोटे बेटे की मौत की खबर फोन पर देते वक्त कहा- रोकर घर मत आना।’

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